मैं कहीं जगह रिसर्च किया और कई बुक्स पड़ी उसके बाद यह ब्लॉग लिख रहा हूं इसमें कुछ ऐसे गलतफहमियां है जो हमें पढ़ाई जाती है लेकिन हमको पता नहीं होता उनका जो अपने इतिहास की है। इतिहास हमें सिर्फ अतीत की कहानियाँ नहीं देता, बल्कि सोचने का तरीका भी देता है। लेकिन यहाँ एक सच्चाई है जिसे हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। जो इतिहास हमें स्कूल में पढ़ाया गया, वह पूरा इतिहास नहीं था। वह एक चुना हुआ, आसान बनाया गया और कई बार अधूरा इतिहास था। इसका मतलब यह नहीं कि सब कुछ झूठ था, लेकिन बहुत कुछ ऐसा था जिसे या तो सरल कर दिया गया या फिर नजरअंदाज कर दिया गया। यहाँ बात किसी साजिश की नहीं है। बात है सिस्टम की सीमाओं की, किताबों की जगह की और उस नजरिये की जिससे इतिहास लिखा गया। अब जब हमारे पास पढ़ने, समझने और सवाल पूछने की आज़ादी है, तो यह जरूरी हो जाता है कि हम कुछ पुरानी मान्यताओं को दोबारा देखें। आइए, साफ दिमाग से बात करते हैं। यहाँ भारतीय इतिहास से जुड़ी 7 ऐसी गलतफहमियाँ हैं जो हमें स्कूल में पढ़ाई गईं, लेकिन पूरी सच्चाई नहीं बतातीं।
1. भारत अंग्रेजों के आने से पहले पिछड़ा और बिखरा हुआ था
स्कूल की किताबों में अक्सर यह भावना दी जाती है कि अंग्रेजों के आने से पहले भारत अव्यवस्थित था। छोटे छोटे राज्य आपस में लड़ते रहते थे और कोई मजबूत प्रशासन नहीं था। यहाँ असली बात समझने की है। भारत राजनीतिक रूप से एक राष्ट्र भले न रहा हो, लेकिन सांस्कृतिक और आर्थिक रूप से वह बेहद संगठित था। मौर्य, गुप्त, चोल, विजयनगर और मराठा जैसे साम्राज्य मजबूत प्रशासन, टैक्स सिस्टम और कानून व्यवस्था चला रहे थे। सत्रहवीं सदी तक भारत दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक था। कपड़ा उद्योग, धातु विज्ञान, जहाज निर्माण और कृषि व्यवस्था उन्नत थी। अंग्रेज किसी उजड़े देश में नहीं आए थे। वे एक चलती हुई व्यवस्था में आए और धीरे धीरे उसका फायदा उठाया।
2. अंग्रेजों ने भारत को आधुनिक बनाया
रेलवे, डाक व्यवस्था, अदालतें। स्कूल में हमें बताया गया कि यह सब अंग्रेजों की देन है और उन्होंने भारत को आधुनिकता दी। अब यहाँ थोड़ा ठहरकर सोचते हैं। रेलवे भारत के लिए नहीं, बल्कि अंग्रेजों के लिए बनी थी। कच्चा माल बंदरगाह तक पहुँचाने और सैनिकों की आवाजाही के लिए। शिक्षा प्रणाली का उद्देश्य भी भारतीयों को सोचने वाला नहीं, बल्कि आज्ञाकारी क्लर्क बनाना था। अंग्रेजों ने जो भी ढांचा बनाया, वह अपने फायदे के लिए बनाया। इसका मतलब यह नहीं कि उसका कोई उपयोग नहीं हुआ, लेकिन यह कहना कि उन्होंने भारत को आधुनिक बनाया, अधूरी सच्चाई है। भारत की अपनी ज्ञान परंपरा, विश्वविद्यालय और विज्ञान पहले से मौजूद थे, जिन्हें जानबूझकर कमजोर किया गया।
3. मुगल शासक सिर्फ विदेशी आक्रमणकारी थे
स्कूल की किताबों में मुगलों को अक्सर बाहरी शासकों की तरह दिखाया जाता है, जैसे उनका भारत से कोई संबंध ही नहीं था। हकीकत थोड़ी अलग है। शुरुआती मुगल जरूर मध्य एशिया से आए थे, लेकिन अकबर के बाद के मुगल पूरी तरह भारतीय हो चुके थे। उनकी भाषा, संस्कृति, प्रशासन और सोच भारत से जुड़ी थी। अकबर का प्रशासनिक ढांचा, धार्मिक सहिष्णुता और स्थानीय राजाओं से गठबंधन किसी विदेशी शासक की सोच नहीं थी। इतिहास को सिर्फ धर्म या मूल स्थान के आधार पर देखना उसे बहुत छोटा कर देता है।
4. 1857 की क्रांति सिर्फ एक सिपाही विद्रोह थी
स्कूल में 1857 को अक्सर सिपाही विद्रोह कहा जाता है, जैसे यह कुछ नाराज सैनिकों की बगावत भर थी। असल में यह कहीं ज्यादा व्यापक आंदोलन था। इसमें किसान थे, जमींदार थे, राजघराने थे और आम लोग थे। यह अलग अलग क्षेत्रों में अलग कारणों से फूटा, लेकिन भावना एक ही थी। विदेशी शासन के खिलाफ गुस्सा। यह सही है कि यह आधुनिक राष्ट्रवादी आंदोलन नहीं था, लेकिन इसे छोटा करके दिखाना भी गलत है। यह भारत की आज़ादी की लड़ाई का पहला बड़ा विस्फोट था।
5. भारत में वैज्ञानिक सोच सिर्फ पश्चिम से आई
यह धारणा भी हमें दी गई कि वैज्ञानिक सोच, गणित और तर्क पश्चिम से आए और भारत सिर्फ आध्यात्मिक था। यह आधा सच भी नहीं है। शून्य की खोज, दशमलव प्रणाली, आयुर्वेद, शल्य चिकित्सा, खगोल विज्ञान और धातु विज्ञान भारत में सदियों पहले विकसित हो चुके थे। तक्षशिला और नालंदा जैसे विश्वविद्यालय अंतरराष्ट्रीय शिक्षा केंद्र थे। पश्चिम से ज्ञान आया, इसमें कोई शक नहीं। लेकिन यह कहना कि भारत में वैज्ञानिक सोच नहीं थी, हमारी अपनी परंपरा के साथ अन्याय है।
6. स्वतंत्रता आंदोलन सिर्फ कुछ बड़े नेताओं की कहानी थी
स्कूल की किताबों में स्वतंत्रता आंदोलन कुछ नामों के इर्द गिर्द घूमता है। गांधी, नेहरू, पटेल, सुभाष। ये सभी महत्वपूर्ण थे, लेकिन आंदोलन सिर्फ इन तक सीमित नहीं था। आदिवासी विद्रोह, किसान आंदोलन, महिलाओं की भागीदारी और स्थानीय संघर्षों को बहुत कम जगह दी गई। भील आंदोलन, संथाल विद्रोह, तेभागा आंदोलन जैसे संघर्षों के बिना आज़ादी की कहानी अधूरी है। इतिहास सिर्फ बड़े मंचों पर दिए गए भाषणों से नहीं बनता, वह जमीन पर चल रहे संघर्षों से बनता है।
7. इतिहास पूरी तरह निष्पक्ष होता है
शायद सबसे बड़ी गलतफहमी यही है कि इतिहास जो लिखा गया, वह पूरी तरह निष्पक्ष है। सच यह है कि इतिहास हमेशा किसी न किसी नजरिये से लिखा जाता है। कौन लिख रहा है, किस दौर में लिख रहा है और किसके लिए लिख रहा है, यह सब मायने रखता है। औपनिवेशिक दौर में लिखा गया इतिहास अलग नजरिये से लिखा गया। आजादी के बाद लिखा गया इतिहास अलग प्राथमिकताओं के साथ आया। इसका मतलब यह नहीं कि सब झूठ है, बल्कि यह कि हर पाठक को सवाल पूछने चाहिए।
आखिर में बात सीधी है
इतिहास कोई पत्थर की लकीर नहीं है। वह एक जीवित चर्चा है। जितना हम पढ़ते हैं, उतना ही हमें सोचने की जरूरत होती है। स्कूल की किताबें शुरुआत के लिए होती हैं, अंतिम सच के लिए नहीं। जब हम पुरानी गलतफहमियों को पहचानते हैं, तो हम न सिर्फ इतिहास को बेहतर समझते हैं, बल्कि खुद को भी।
यह लेख किसी को गलत ठहराने के लिए नहीं है। यह बस एक न्योता है। सवाल पूछने का, पढ़ने का और चीजों को नए नजरिये से देखने का। क्योंकि सच यही है। इतिहास सिर्फ याद रखने की चीज नहीं है। उसे समझना पड़ता है।

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